“झूठा अहंकार” श्री कृष्ण सत्यभामा कथा

श्री कृष्ण सत्यभामा कथा

श्री कृष्ण सत्यभामा कथा

“झूठा अहंकार”

श्री कृष्ण सत्यभामा कथा
“झूठा अहंकार”
श्री कृष्ण सत्यभामा कथा

श्री कृष्ण भगवान द्वारका में अपनी रानी सत्यभामा के साथ बैठे थे ।

निकट ही गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे हुए थे ।

बातों ही बातों में सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु, आपने राम के रूप में अवतार लिया था, सीता जी आपकी पत्नी थीं ।

क्या वे मुझसे ज्यादा सुंदर थीं ?

प्रभु  समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है ।

गरुड़ ने भी मौका देखकर प्रभु से पूछ लिया कि भगवान क्या दुनियाँ में मुझसे भी ज्यादा तेज कोई उड़ सकता है ?

अब सुदर्शन चक्र भी पीछे क्यों रहते उसने भी तुरंत प्रभु से पूछ लिया कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजय दिलवाई है ।

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क्या इस संसार में मुझसे भी अधिक शक्तिशाली कोई और है ?

प्रभु समझ गए थे कि इन तीनों को अहंकार हो गया है और अब इनका अहंकार नष्ट होने का समय आ गया है ।

श्री कृष्ण की तरकीब

तभी प्रभु ने गरुड़ से कहा कि हे गरुड़,  तुम हनुमान जी के पास जाओ और उनसे कहना कि भगवान राम और माता सीता उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।

यह सुनकर गरुड़ तुरंत हनुमान जी को लाने चल दिए ।

इधर प्रभु सत्यभामा से बोले कि देवी आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं उन्होंने राम का रूप धारण कर लिया ।

इसके बाद प्रभु ने सुदर्शन चक्र से कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और यह ध्यान रहे कि बिना मेरी आज्ञा के कोई भी महल में प्रवेश न कर सके।

यह आज्ञा पाकर सुदर्शन चक्र तुरंत महल के मुख्य द्वार पर जा कर खड़े हो गए ।

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उधर गरुड़ जी ने हनुमान जी के पास पहुंच कर प्रभु का संदेश दिया और कहा आप मेरे साथ चलें ।

मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा ।

हनुमान जी ने गरुड़ से कहा कि आप चलिए, मैं आता हूं ।

गरुड़ ने सोचा न जाने यह बूढ़ा वानर कब तक पहुंचेगा ।

मै तो प्रभु के पास चलता हूं ।

यह सोचकर गरुड़ तीव्र गति से द्वारका की ओर उड़े चले ।

श्री कृष्ण सत्यभामा कथा

पर यह क्या, महल में पहुंचकर गरुड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं ।

गरुड़ का सबसे तीव्र गति से उड़ने का अहंकार चूर चूर हो गया और उनका सिर झुक गया ।

तभी प्रभु ने हनुमान जी से पूछा कि तुमने बिना मेरी आज्ञा के महल में प्रवेश कैसे किया ?

क्या आपको किसी ने रोका नहीं ?

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इस पर हनुमान जी ने क्षमा मांगते हुए अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकाल कर प्रभु के सामने रख दिया ।

हनुमान जी ने कहा कि प्रभु इस सुदर्शन चक्र ने मुझे आपसे मिलने से रोका था, इसलिए इसे अपने मुँह में रख कर मैं आपसे मिलने आ गया ।

मुझे क्षमा करें प्रभु ।

इस प्रकार सुदर्शन चक्र का अहंकार भी खंड खंड हो गया ।

इसके बाद हनुमान जी ने हाथ जोड़ते हुए प्रभु से प्रश्न किया कि –

हे प्रभु , आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को अपने साथ सिंहासन पर बैठा लिया है ?

माता सीता कहाँ है ?

अब रानी सत्यभामा का अहंकार भी भंग होने की बारी थी ।

उनका भी सुंदरता का अहंकार पलभर में चूर हो गया था और उनका सर भी शर्म से झुक गया ।

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तो इस प्रकार सत्यभामा, सुदर्शन चक्र और गरुड़ अब तीनों का घमंड टूट चुका था ।

तीनों प्रभु की लीला समझ चुके थे ।

तीनो के सिर प्रभु के चरणों मे झुक गए थे और तीनों की ही आंखों से अश्रु बह रहे थे ।

निष्कर्ष 

दोस्तों कहने का तात्पर्य केवल इतना है कि कई बार अहंकार बहुत ही सूक्ष्मता से अपनी जगह बना लेता है ।

अगर अहंकार है तो इसका टूटना भी निश्चित ही है , 

यहाँ कुछ भी शाश्वत (Permanent) नहीं है, लगातार सब बदलता रहता है, यही प्रकृति का नियम है ।   

इसलिए अपनी किसी भी चीज पर घमंड करना कहाँ तक उचित है !

ये सिर्फ आपके ऊपर है । 

श्री कृष्ण सत्यभामा कथा

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 ~END~

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