“द्रौपदी चीर हरण” आखिर ! क्यूँ रहे पितामह खामोश ! Mahabharat ki kahaniya

Mahabharat ki kahaniya

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“द्रौपदी चीर हरण” आखिर ! क्यूँ रहे पितामह खामोश !

Mahabharat ki kahaniya
आखिर !
क्यूँ रहे “पितामह” खामोश !
Mahabharat ki kahaniya

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद युद्ध मे घायल भीष्म पितामह मृत्युपर्यन्त शर शैय्या यानी बाणों पर लेटे रहे थे ।

लोग उनसे मिलने वहीं आते रहते थे ।

एक बार उनसे मिलने युधिष्ठर और द्रोपदी आए ।

उन्हें उपदेश देते हुए भीष्म पितामह बहुत सारगर्भित और सूक्ष्म ज्ञान की बातें कर रहे थे ।

तभी वहीं उपस्थित द्रौपदी ने कहा – हे पितामह !

मेरे मन में एक जिज्ञासा है, अगर अनुमति दें तो पूछूँ ?

भीष्म ने कहा – पूछो बेटी,  जो भी तुम्हारे मन ने जिज्ञासा है, बिना संकोच पूछो ।

द्रौपदी ने कहा – पितामह !

मैं आपसे क्षमा मांगते हुए  पूछना चाहती हूँ  कि जब दुर्योधन की सभा में दुःशासन मुझे वस्त्रहीन करने के लिए मेरा चीर खींच रहा था ।

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तब मैं रो रही थी चिल्ला रही थी और अपनी लाज बचाने के लिए सबसे प्रार्थना कर रही थी तब आप भी वहाँ उपस्थित थे ।

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आप से भी मैने सहायता मांगी थी ।

उस समय आपका ज्ञान ध्यान, पौरुष कहाँ चला गया था ?

उस समय आप एक अबला नारी का अपमान कैसे सहते रहे ?

मेरी पुकार आपने क्यों नहीं सुनी थी ?

भीष्म पितामह का उत्तर

यह सुन भीष्म पितामह बोले – बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है बेटी !

उस समय मैं दुर्योधन का पापयुक्त अन्न जल खाता था ।

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उसी अन्न जल से बना रक्त मेरे शरीर की नस नाड़ियों और मस्तिष्क में बह रहा था ।

उस पाप के प्रभाव से मैं धर्म की बात न तो कह सका और न धर्म के अनुसार आचरण ही कर सका ।

अब अर्जुन के तीरों से बने घावों ने वह पापयुक्त रक्त को बहा दिया है अतः उस पापमय अन्न जल के प्रभाव से मैं मुक्त हो चुका हूँ ।

इसलिए धर्म की बात कह पा रहा हूँ ।

वैसे तो अन्न सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण वाला होता है ।

इन तीनों में सतोगुणी भोजन ही मनुष्य को लेना चाहिए  ।

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परन्तु अगर यह सतोगुणी भोजन भी पापयुक्त धन से आया होगा तो इस भोजन का असर भी मनुष्य के चित्त पर तामसिक ही पड़ेगा ।

क्योंकि मैं हस्तिनापुर के सिंहासन से अपने वचनानुसार बंधा था, मुझे वह पापमय भोजन करना पड़ा और वह सब हुआ ।

बेटी मैं उस सबके लिए तुमसे क्षमा माँगता हूँ ।

यह कहते हुए भीष्म पितामह ने अपनी आंखें बंद कर लीं और उनकी बंद आंखों से निकल कर कुछ आँसू ज़मीन पर गिर पड़े ।

सार 

दोस्तों आपने ये अवश्य सुना होगा कि जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन, जैसा पीओ पानी वैसी होगी वाणी ।

यह बात सौ प्रतिशत सही है और हर काल मे यह सही सिद्ध होती आ रही है । 

इस कहानी से क्या हमे यह शिक्षा नहीं लेनी चाहिए कि हम सदैव शुद्ध एवं उचित अन्न जल ही ग्रहण करना चाहिए ।

एक बार ज़रूर सोचें….. !

 ~END~

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