“माया” SHRI KRISHNA & SUDAMA STORY 

Shri krishna sudama story

“माया”

SHRI KRISHNA SUDAMA STORY 

क्या ये जगत सचमुच एक “माया” है ???

Shri Krishna Sudama Story
“माया”
Shri Krishna Sudama Story

सुदामा जी ने एक बार भगवान श्री कृष्ण से पूछा- कान्हा, आपकी माया कैसी होती है ?

मैं उसके दर्शन करना चाहता हूं… !

भगवान श्री कृष्ण ने पहले तो उसे टालना चाहा, लेकिन उसने जिद पकड़ ली ।

तब प्रभु ने कहा, “ठीक है, जब वक्त आएगा तब अवश्य दिखाऊंगा” ।

फिर कुछ दिनों पश्चात एक दिन सुदामा से कहने लगे-” आओ, गोमती में स्नान करने चलते हैं” ।

दोनों गोमती के तट पर पहुंचे, वस्त्र उतारे, नदी में उतरे… ।

स्नान करके श्री कृष्ण तो तट पर लौट आए और वस्त्र पहनने लगे ।

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यह देख सुदामा ने सोचा कि क्यूं न मैं एक डुबकी और लगा लूँ ।

और जैसे ही सुदामा ने डुबकी लगाई… भगवान ने उसे अपनी माया का दर्शन करा दिया|

श्रीकृष्ण की माया 

सुदामा को महसूस हुआ कि गोमती में बाढ़ आ गई है और वह बहे जा रहे हैं,

सुदामा जैसे-तैसे किनारे पहुंचे ।

किनारे पहुंच कर वह घूमते-घूमते एक गाँव के पास आए, वहां एक हथिनी ने उनके गले में फूल माला डाल दी ।

इस बात से सुदामा हैरान हो ही रहे थे कि तभी वहाँ बहुत से लोग इकट्ठे हो गए ।

लोगों ने उन्हें बताया कि, “हमारे देश के राजा की मृत्यु हो गई है, तथा हमारा यह नियम है कि राजा की मृत्यु के बाद हथिनी, जिस भी व्यक्ति के गले में माला  डाल देती है, वही हमारा नया राजा होता है ।

इसलिए अब आप हमारे राजा हैं”।

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सुदामा बहुत हैरान हुआ, राजा बन गया,  एक सुंदर राजकन्या के साथ उसका विवाह भी हो गया, दो पुत्र भी पैदा हो गए ।

तभी एक दिन उसकी पत्नी बीमार पड़ गई, और बीमारी के कारण ही उसकी मौत हो गई ।

सुदामा को बहुत दुःख हुआ और वह रोने लगा तभी वहाँ लोग इकट्ठे हो गए ।

लोगों ने सुदामा से कहा, आप रोएं नहीं, क्योंकि बहुत जल्द ही रानी जहां गई है, वहीं आप को भी जाना है ।

यह इस मायापुरी में राजा के लिए नियम है कि उसे भी अपनी पत्नी के साथ चिता में बैठना होगा, तब ही चिता को अग्नि दी जाएगी।

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आपको भी अपनी पत्नी के साथ ही जलना होगा और परलोक गमन करना होगा ।

यह सुनते ही सुदामा की सांस अटक गई , घबराहट के मारे उसके हाथ पाँव काँपने लगे ।

उसे अपनी मृत्यु सामने दिखाई देने लगी थी ।

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उसने कहा कि भला ये भी कोई नियम होता है, मरी तो मेरी पत्नी है मैं तो नहीं मरा, फिर मैं चिता में क्यूँ बैठूं ?

सुदामा यह सब सुनकर अपनी पत्नी की मृत्यु तो जैसे भूल ही गया ।

उसका रोना धोना भी बंद हो गया ।

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अब तो उसे केवल एक ही चीज दिखाई दे रही थी और वह थी उसकी मौत ।

सुदामा ने लोगों से कहा कि वो तो मायापुरी का वासी भी नहीं है इसलिए आपकी नगरी का कोई भी कानून मुझ पर लागू ही नहीं होता ।

इसलिए आप मुझे मेरी पत्नी के साथ जलने को विवश नहीं कर सकते।

परन्तु लोग नही माने उन्होंने कहा कि यह हमारी नगरी का नियम है जिसे आप को मानना ही पड़ेगा ।

आपको अपनी पत्नी के साथ चिता में जलना ही होगा ।

अंत मे मजबूर होकर सुदामा ने उनसे कहा कि -“ठीक है जैसी आप लोगों की मर्जी ।

आखिरी इच्छा 

लेकिन चिता में जलने से पहले मुझे नदी में स्नान तो करने दो”

पहले तो वह लोग नहीं माने परंतु बाद में उन्होंने सुदामा को नदी स्नान करने की इजाज़त दे दी ।

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उन्होंने सुदामा के चारों ओर हथियारबंद सैनिक खड़े कर दिए कि सुदामा कहीं भाग न जाए ।

सुदामा की आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं के रहे थे ।

वह बच्चों की तरह बिलखने लगा था ।

दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, अब जैसे मृत्यु सामने ही खड़ी थी ।

उसने कांपती टांगों से नदी में जाकर डुबकी लगाई ।

डुबकी लगा कर सुदामा जैसे ही बाहर निकला , उसने देखा वहां ना तो मायानगरी है और न ही वो सशस्त्र सैनिक वहां खड़े हैं ।

थोड़ी दूर दृष्टि जाने पर उसने देखा कि प्रभु कृष्ण नहाने के बाद अभी अपने वस्त्र ही पहन रहे थे ।

इतनी सी देर में उसने तो जैसे पूरी एक दुनिया ही देख ली थी ।

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सुदामा नदी से बाहर आया परंतु उसके आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, क्योंकि वह अपनी मौत के इतने करीब से लौट कर जो आ रहा था ।

भगवान श्री कृष्ण सब जानकर भी अनजान बनते हुए उसे हैरानी से देख रहे थे । उन्होंने सुदामा से पूछा-” मित्र , क्या हुआ, तुम रो क्यों रहे हो”?

सुदामा ने कहा -” कान्हा, मैने जो देखा वह सच था या जो मैं देख रहा हूँ वह सच है “?।

प्रभु श्रीकृष्ण मुस्कुराए और कहा –

“तुमने जो देखा, भोगा वह सच नहीं था… भ्रम था…. एक स्वप्न था …माया थी मेरी  और जो तुम अब मुझे देख रहे हो, यही सच है, मैं ही सच हूं, मुझ से भिन्न, जो भी है, वह सब मेरी माया  है ।

जो मुझे ही सर्वत्र देखता है, महसूस करता है, उसे मेरी माया स्पर्श भी नहीं कर पाती ।

माया स्वयं का (सत्य का) विस्मरण है, माया अज्ञान है, माया परमात्मा से भिन्न है  ।

माया एक नर्तकी है जो खुद नाचती है और दूसरों को नचाती है, लेकिन जो मेरे (श्री कृष्ण) से जुड़ा है, वह न ही नाचता है , न ही भ्रमित होता है ।

वह माया के भ्रम जाल से बचा रहता है, वह  सत्य को जान जाता है ।

सुदामा भी अपने कान्हा की कृपा से उनकी माया को जान गए थे ।

Story Forwarded by : “SHRI SHAILESH SHARMA” 

(With due Thanks) 

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 ~END~~

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Comments 1

  • इस दुनियां में अगर कहीं किसी ने दोस्ती की सच्ची मिसाल पेश की है तो वह श्री कृष्ण और सुदामा की दोस्ती ने की है| अटूट प्रेम और श्रद्धा का उदारहण है कृष्ण सुदामा की दोस्ती|

    धन्यवाद




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