“भूत आया” STORY “सच या धोखा”

STORY सच या धोखा

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“भूत आया” 

STORY सच या धोखा
“भूत आया”
STORY सच या धोखा

सन 1960, दिल्ली शाहदरा की एक बस्ती ।

बस्ती में कच्चे पक्के मकान और कुछ  झोपड़ियां, कुल मिला कर चार सौ-पांच सौ लोग रहते थे वहां ।

पास से ही गुजरती एक कच्ची सड़क और उस पर खड़े दो ख़जूर के पेड़ ।

वहीं पर एक बड़ी सी झोंपड़ी थी हीरादई और नत्थू की ।

नत्थू रोज़ शराब पी कर आता था और किसी न किसी बात पर हीरादई की पिटाई करता था ।

यह मार पिटाई उनका लगभग रोज का काम था ।

इसीलिए  कोई उधर ज़्यादा ध्यान नही देता था ।

एक दिन सुबह से ही नत्थू ने शराब पीनी शुरू कर दी थी ।

शराब पीने के बाद उसका और हीरादई का झगड़ा होना शुरू हो गया था ।

दिन भर उनके  झगड़े और मारपीट की आवाजें आती रहीं ।

झोंपड़ी का जलना 

पुराना ज़माना था रात के 10 बज रहे थे लोग लगभग सो चुके थे ।

तभी गली में  शोर सुनाई दिया ।

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बाहर जा कर देखा तो हीरादई की झोंपड़ी धू धू कर जल रही थी ।

लोग बाल्टियों से पानी फेंक कर आग को बुझाने का असफल प्रयास कर रहे थे ।

कुछ ही समय पश्चात वो झोंपड़ी राख़ के ढेर में बदल चुकी थी ।

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लोगों की निगाहें हीरादई और नत्थु को ढूंढ रही थीं लेकिन वो दोनों किसी को दिखाई नहीं दिए ।

लोगों ने सोचा कहीं वो दोनों इस आग में ही तो जल कर नहीं मर गए ।

अभी यह उलझन चल ही रही थी कि वहाँ गली में ही रहने वाला लड़का कन्हैया आया ।

कन्हैया ने बताया कि उस ने बस स्टैंड पर नत्थु को किसी बस में चढ़ते हुए देखा है ।

वह अकेला ही था उसके साथ हीरादई नहीं थी ।

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अब ये बात साफ हो गई कि नत्थु जिंदा है ।

परंतु हीरादई का क्या हुआ ?

क्या नत्थु ने उसे मार कर झोंपड़ी में आग लगा दी या हीरादई ने खुद ही जल कर आत्महत्या कर ली ?

अंत मे यह फैंसला लिया गया कि पुलिस को सूचना दे दी जाए ।

सूचना दी गई, पुलिस आई , सुलगती राख को टटोला गया परंतु हीरादई की लाश नहीं मिली ।

इस पर लोगों ने अंदाज़ा लगाया कि आग इतनी तेज थी कि उसमें उसकी हड्डियां भी जल कर भस्म हो गईं ।

बहुत रात हो चुकी थी लोग धीरे धीरे अपने अपने घरों को लौट गए ।

इस घटना को बीते लगभग दस पंद्रह दिन बीत चुके थे ।

हीरादई का भूत

एक रात गली में रहने वाला लड़का बंसी, जो कि काम से अक्सर देर से घर लौटता था ज़ोर ज़ोर से बचाओ बचाओ चिल्लाता हुआ घर की ओर भागा चला आ रहा था ।

पसीने से  तरबतर, काँपता हुआ सीधे आ कर अपने पिता जी से लिपट गया ।

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बड़ी मुश्किल से उसने डरते डरते बताया कि रास्ते मे जो खजूर के पेड़ हैं उसके नीचे मुझे एक भूत दिखाई दिया ।

वह मेरी तरफ आ रहा था और कह रहा था – मुझे प्यास लगी है मुझे पानी दो ।

मैं तो वहां से जान बचा कर भाग निकला ।

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देखने मे वह भूत ऐसा लग रहा था जैसे कि हीरादई हो ।

बंसी के यह बताने के बाद यह खबर जंगल मे आग की तरह फैल गई कि बंसी ने हीरादई का भूत देखा है ।

हीरादई भूत बन गई है और ख़जूर के पेड़ पर रहती है ।

उस दिन के बाद और भी बहुत से लोगों ने हीरादई का भूत देखा ।

वह भूत सभी से पानी मांगता था ।

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ख़जूर के पेड़ के नीचे लोगों ने एक पानी का भरा मटका भी रख दिया ।

लेकिन हीरादई की आत्मा का भटकना कम नहीं हुआ ।

हीरादई का खौफ़  

उसी दौरान एक दस बारह साल की लड़की अजीब अजीब हरकतें करने लगी ।

कभी रोती थी, कभी लाल-लाल आंखे निकाल कर जोर जोर से चींखती थी ।

उसको जैसे दौरा सा पड़ गया था ।

लोगों ने उसकी हालत देख कर कहा कि लगता है कि इस पर कोई आत्मा का प्रकोप हो गया है ।

तुरंत ढूंढ मची और एक तांत्रिक को बुलाया गया ।

तांत्रिक ने आ कर पानी मे मंत्र पड़ कर उस लड़की पर डाला ।

काफी देर तंत्र मंत्र का सिलसिला चलता रहा ।

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बीच बीच मे लड़की “पानी पिलाओ-पानी पिलाओ, मैं जल रही हूँ” चिल्लाती रही ।

बहुत देर बाद जा कर लड़की ठीक हुई ।

लोगों ने अंदाज़ा लगा लिया था कि हो न हो उस लड़की पर हीरादई का भूत ही चढ़ा था ।

इस घटना तीन चार दिनों के बाद  किसी औरत पर भूत चढ़ने की ख़बर आ गई ।

अब उस बस्ती में हीरादई के भूत के दिखने और चढ़ने की खबरे जब तब आने लगीं थीं ।

हीरादई के भूत का ख़ौफ़ सारी बस्ती पर छा गया था ।

लोगों ने दिन ढले घर से निकलना बंद कर दिया था ।

इसी तरह दिन बीतते गए और लगभग छ-सात महीने गुजर गए ।

रविवार का दिन था  सभी लोग गली में खड़े होकर सर्दियों की धूप के मज़े ले रहे थे ।

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तभी एक रिक्शा आ कर हीरादई की जली हुई झोंपड़ी के आगे रुका ।

उस रिक्शा में से पहले नत्थु उतरा और उसके बाद एक औरत उतरी ।

लोग हैरानी से उस औरत को देख रहे थे ।

क्योंकि वह औरत और कोई नहीं खुद हीरादई थी ।

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वो अपनी जली हुई झोंपड़ी को देख कर रोने लगी थी ।

लोगों ने उन से पूछा की तुम कहाँ थे अब तक ।

तब हीरादई ने बताया कि उस रात हमारा झगड़ा तो हो ही रहा था ।

ये मुझे छोड़ कर, कभी वापस न आने की बात कह कर चले गए थे ।

मैने सोचा कि मैं अकेली यहां रह कर क्या करूंगी ?

मैं भी गुस्से के मारे घर को ऐसे ही छोड़ कर बिना ताला लगाय चली गई थी ।

हो सकता है पीछे जो दिया मैं जला हुआ छोड़ गई थी उसके कारण आग लग गई होगी ।

वहाँ गाँव मे इनके और मेरे घरवालों ने मिलकर हमारी लड़ाई खत्म करवाई ।

इन सब बातों में इतना समय लग गया और आज हम यहां वापस आ गए ।

उनकी बातें सुन कर उनको झोंपड़ी दोबारा बनाने में पूरी सहायता का आश्वासन देते हुए लोग वापस आ गए ।

लेकिन किसी ने भी उन्हें हीरादई के भूत के बारे में नहीं बताया ।

उस दिन के बाद न तो किसी को कोई भूत दिखाई दिया और न ही किसी पर भूत चढ़ा ।

अब सवाल यह उठता है कि वो भूत दिखाई देना और भूत का चढ़ना, तांत्रिक द्वारा ठीक होना, वो भी किसी एक आदमी के साथ नहीं  बहुत से लोगों के साथ होना,

वो क्या था ?

ज़रा सोचिए !

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 ~END~

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